गरम बदन की आग को बुझाया

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Garam badan ki aag ko bujhaya सुबह जब मैं उठा तो मौसम काफी सुहाना था उस वक्त 6:30 बज रहे थे मैंने सोचा चलो जल्दी से तैयार हो जाता हूं और ऑफिस के लिए निकलता हूं। आसमानों में काले बादलों ने अपनी जगह बना ली थी ऐसा लग रहा था कि बस अभी बरसने वाले हैं, मैं तैयार हो चुका था मेरी भाभी मुझे कहने लगी देवर जी नाश्ता कर लीजिएगा। मैंने भाभी से कहा ठीक है भाभी जी मैं नाश्ता कर लूंगा उन्होंने मेरे लिए नाश्ता बना दिया था मैं डाइनिंग टेबल पर बैठा तो वह मेरे लिए नाश्ता ले आए गरमा गरम पराठे खाना बड़ा ही मजेदार था। मैं पराठे का काफी शौकीन हूं इस वजह से दिन-ब-दिन मेरा वजन भी बढ़ता जा रहा है लेकिन मेरे मुंह पर तो जैसे पराठे का स्वाद लगा हुआ है मुझे पराठे खाना बड़ा अच्छा लगता है।

मैं पराठे खा ही रहा था तभी भैया भी आये और कहने लगे कमल तुम ऑफिस के लिए निकल रहे हो मैंने भैया से कहा हां भैया मैं ऑफिस के लिए निकल रहा हूं। भैया कहने लगे आज तो मैंने छुट्टी ले ली है और आज मैं घर पर ही हूं मैंने भैया से कहा ठीक है भैया मैं अभी चलता हूं। मैं अपने दफ्तर के लिए निकल पड़ा मैं जैसे ही घर से बाहर निकला तो मैंने देखा आसमान से बूंदा बांदी होने लगी थी। मैं अपनी मोटरसाइकिल स्टार्ट कर ही रहा था कि मुझे लगा मोटरसाइकिल से जाना है ठीक नहीं है मैं आज बस से ही चला जाता हूं मैंने अपनी भाभी से कहा आप मुझे छाता दे दीजिए। भाभी ने मुझे छाता दे दिया और उसके बाद मैं वहां से बस स्टॉप की तरफ पैदल ही निकल पड़ा। बस स्टॉप कुछ दूरी पर ही है मैं जैसे ही बस स्टॉप पहुंचा तो बारिश बहुत तेजी से शुरू हो गई थी बस स्टॉप पर एक लड़की छाता ओढ़े खड़ी थी। मेरी नजर जब उस पर पडी तो मुझे ऐसा लगा कि जैसी लड़की के बारे में मैं सोचा करता था बिल्कुल वह उसी की तरह थी मैं कल्पनाओं में सुबह उस लड़की को अपने दिमाग में सोचता था। मै उसकी तरफ देखने की कोशिश करता लेकिन मेरी नजर जैसे ही उस लड़की पर पड़ती तो मैं अपनी नजरों को उससे हटा लिया करता मुझे डर था कि कहीं वह भी मेरी तरफ तो नहीं देख रही। जैसे ही बस आई तो हम लोग बस में बैठ गए मैं उस लड़की के बिल्कुल पीछे ही खड़ा था क्योंकि बस में बैठने की जगह नहीं थी।

उसने अपने छाते को बंद तो कर लिया था लेकिन उसके हाथ से वह छाता गिर गया फिर मैंने छाता उठाकर उसे दिया और जैसे ही उसने मेरी तरफ देखा तो मेरी आंखें उसकी आंखों से टकराने लगी और वह भी मुझे देखने लगी। मेरे अंदर इतनी हिम्मत नहीं हुई कि मैं उससे बात कर सकूँ वह मेरे आगे ही खड़ी थी तो मैं उसे देखता रहा जैसे ही मेरा ऑफिस आया तो मैं उतर गया। मैं ऑफिस पहुंचकर सिर्फ उसी की कल्पना में खोया रहा मैंने अपने दोस्त सुधीर को भी इस बारे में बताया तो सुधीर कहने लगा यार ऐसा तो मेरे साथ भी कई बार होता है लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं है कि वह लड़की तुम्हे दोबारा भी मिलेगी तुम अब उसके बारे में भूल जाओ और तुम्हें मालूम है कि आज बॉस बहुत ज्यादा गुस्से में थे। मैंने उससे पूछा लेकिन आज बॉस गुस्से में क्यो है वह कहने लगा हो सकता है उनकी कोई परिवारिक समस्या हो जिस वजह से वह परेशान हो अब मुझे भी इस बारे में पता नहीं है लेकिन यदि आज अच्छे से काम नहीं किया तो कहीं वह अपने गुस्से को हम पर ही ना उतार दे मैं तो तुम्हें इसलिए बता रहा हूं कि तुम मेरे दोस्त हो। मैंने सुधीर से कहा ठीक है और शाम को जब मैं घर आया तो मेरे दिमाग में सिर्फ यही चल रहा था कि काश वह लड़की मुझे दोबारा मिल जाती। अगले दिन भी मैं तैयार होकर बस स्टॉप चला गया लेकिन वह लड़की मुझे कहीं नहीं दिखी और फिर मैं बस से ही अपने ऑफिस चला गया। अब यह सिलसिला आगे भी बढ़ने लगा था मैं अपनी मोटरसाइकिल से अब ऑफिस नहीं जाता था मैं हमेशा बस से ही ऑफिस जाता था। एक दिन आखिरकार मुझे वह लड़की दिख ही गई और जब वह मुझे दिखी तो उस दिन भी मैं मन ही मन मुस्कुराने लगा था लेकिन उस दिन भी मैं उससे बात नहीं कर पाया। उसके बाद भी कई बार यह सिलसिला चलता रहा मुझे जब भी वह दिखती तो मैं उसे देख कर खुश तो हो जाता था लेकिन मैं उससे बात नहीं कर पाता था। एक दिन उस लड़की के साथ उसकी सहेली भी आई हुई थी और वह दोनों आपस में बात कर रहे थे तो मैं भी सुन रहा था जब उसकी सहेली ने उसका नाम लेकर उसे पुकारा तो तब मुझे उसका नाम पता चल चुका था उसका नाम दीपशिखा है।

मुझे उस लड़की का नाम तो पता चल चुका था लेकिन यह नहीं मालूम था कि वह रहती कहां है वह हर रोज मुझे उसी बस स्टॉप पर मिलती थी। एक दिन उसने मुझसे खुद ही बात कर ली मुझसे वह मेरे बारे में पूछने लगी, इतने दिनों से मैं भी उससे बात करना चाह रहा था मैं उससे बात कर रहा था लेकिन मैं दीपशिखा के साथ ज्यादा देर तक बात ना कर सका और मैं अपने ऑफिस चले गया। जब भी वह मुझे देखती तो मैं हर रोज उससे बात किया करता था और दीपशिखा को भी मुझसे बात करना अच्छा लगता हम दोनों एक दूसरे से काफी देर तक बात किया करते थे और इसी के चलते हम दोनों के बीच में नज़दीकियां भी बढ़ने लगी थी। दीपशिखा भी शायद मेरे साथ समय बिताना चाहती थी और एक दिन मैंने उसे कहा कि क्या तुम मेरे साथ लंच पर चल सकती हो वह मुझे कहने लगी मैं आपको सोच कर बताऊंगी। अभी भी हम दोनों की बात उतनी नहीं हुई थी लेकिन शायद मेरे कहने पर वह मेरे साथ लंच पर आने के लिए तैयार हो गई। हम लोग जब लंच पर गए तो उस दिन दीपशिखा के साथ मैंने काफी अच्छा समय बिताया और उसके बारे में मुझे नजदीक से जानने का मौका भी मिला हम दोनों को ही एक दूसरे से बात कर के अच्छा लगा। हमने उस दिन काफी घंटे साथ बिताए मेरे बारे में मेरे दीपशिखा को पता चल चुका था मुझे इस बात की खुशी थी कि कम से कम दीपशिखा को मेरे बारे में पता तो चल चुका है और हम दोनों की नजदीकियां अब दिन ब दिन बढ़ती जा रही थी।

हम लोग फोन पर भी बात किया करते थे और फोन पर जब हम लोग बात करते तो मुझे दीपशिखा से बात करना अच्छा लगता हम लोग सुबह हमेशा साथ में ही ऑफिस जाया करते थे। मैंने दीपशिखा को अपने कुछ दोस्तों से भी मिलवा उसे मेरे दोस्तों से मिलकर अच्छा लगा वह हर रोज मेरे साथ सुबह बस में ही ऑफिस जाती थी। हम लोग हमेशा एक दूसरे से बात किया करते थे परंतु कुछ समय से वह परेशान चल रही थी मैंने उससे पूछा भी लेकिन उसने मुझे कुछ नही बताया। उसकी परेशानी का कारण मुझे पता नहीं चल पाया था की वह क्यों इतना परेशान है। मैंने दीपशिखा से पूछ लिया कि तुम इतनी परेशान क्यों हो? वह मुझे कहने लगी दरअसल मेरे मम्मी पापा ने मेरे लिए एक लड़का देखा है और मैं नहीं चाहती कि मैं उसे शादी करूं। मैंने दीपशिखा से कहा तुम इतनी चिंता क्यों करती हो सब कुछ ठीक तो हो जाएगा लेकिन उसके दिल में ना जाने क्या था उस दिन तो उसने मुझे कुछ नहीं कहा लेकिन कुछ दिनों बाद वह मुझसे गले लग कर कहने लगी मेरे दिल की धड़कन तुम्हारे लिए धडकती है कमल, मैं किसी और से कैसे शादी कर सकती हूं। मैंने दीपशिखा को अपनी बाहों में लिया तो वह मुझसे लिपट कर अपनी भावनाओं को व्यक्त करने लगी। मेरे और दीपशिखा के बीच पहली बार ही किस हुआ हम दोनों एक दूसरे के साथ किस कर के बहुत खुश थे मैंने दीपशिखा से कहा मैं तुम्हारे परिवार वालों से बात कर लूंगा।

वह कहने लगी इतनी आसानी से वह मानने वाले नहीं हैं लेकिन हम दोनों अपने रिश्ते को आगे बढ़ाने की पूरी कोशिश कर रहे थे। हम दोनो ने अपने रिश्ते को आगे बढ़ाया इसी दौरान अब हम दोनों एक दूसरे से खुलकर बातें किया करते थे। एक दिन मैने गलती से दीपशिखा के स्तनों पर अपने हाथ का स्पर्श किया तो वह मेरी तरफ देखकर कहने लगी तुम यह क्या कर रहे थे। मैंने उसे कहा कुछ भी तो नहीं लेकिन उस दिन शायद मैंने जो चिंगारी दीपशिखा के दिल में लगा दी थी वह पूरी होने वाली थी और आखिरकार सब कुछ वैसा ही हुआ जैसा मैं चाहता था। दीपशिखा मेरे लिए तड़प रही थी और वह चाहती थी कि हम दोनों अकेले साथ में समय बिताएं। एक दिन उसने अपने दिल की बात मुझसे कह दी मैंने भी उस से कहा तुम मेरे घर पर आ जाना तो वह भी मान गई और मेरे घर पर आ गई। घर में जिस दिन वह आई उस दिन घर में कोई नहीं था हम दोनों एक दूसरे से बातें करते करते पता नहीं कब एक दूसरे की बाहों में आ गए कुछ पता ही नहीं चला।

एक दूसरे के बदन की गरमाहट से हम दोनों ही पसीना पसीना होने लगे थे। मैं दीपशिखा के होठों को चूमने लगा तो वह भी अब रह ना सकी और मुझे कहने लगी मुझे अच्छा लग रहा है तुम ऐसे ही मेरे होठों को चूसते रहो। मैंने दीपशिखा के गुलाबी होठों से खून भी बाहर निकाल कर रख दिया था जब मैंने अपने मोटे से लंड को दीपशिखा के मुलायम और चिकनी चूत पर लगाया तो शायद पहली बार ही उसकी योनि पर किसी के लंड के लंड टच हुआ था। वह घबराने लगी लेकिन उसकी गीली हो चुकी चूत के अंदर मैंने तेजी से अपने लंड को प्रवेश करवा दिया और जैसे ही मेरा मोटा लंड उसकी योनि के अंदर प्रवेश हुआ तो वह चिल्ला उठी उसके मुंह से तेज चीख निकली उसी के साथ उसने मुझे कसकर पकड़ लिया। मैंने उसे काफी देर तक धक्के दिए जब उसकी योनि से चिकनाई और खून दोनों ही तेजी से बाहर निकलने लगा तो मैंने उसके पैरों को खोल लिया और उसकी योनि से जो खून निकलता वह मेरे अंडकोषो के ऊपर लगने लगाता लेकिन उसे भी आनंद आने लगा था। हम दोनों ही आखिरी क्षणों में पहुंच गए और मैंने भी अपने गरम वीर्य से दीपशिखा के गरम बदन की आग को बुझा दिया।


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